वक़्त!! अजीब है ना?
आज आँख बंद करता हूँ तो एक पूरी फिल्म सी चल जाती है सामने,
किसी स्लाइड पे हंसी आती है, तो
कभी पछतावे का भी एहसास होने लगता है,
अगले ही पल एक लम्बी साँस छोड़ते हुए आँखें खोल लेता हूँ और
खुद से कहता हूँ वक़्त!!
कभी बचपन याद आता है, तो कभी माँ,
कभी स्कूल याद आता है, तो कभी वहाँ के बिसरे दोस्त!!
कभी चुपके से क्रिकेट खेलकर पेट दर्द का बहाना बनाता था,
तो कभी नाई की दूकान में बहुत भीड़ होने का ड्रामा!!
कभी नई पेन के लिए बहनों को मक्खन,
तो कभी नए कपड़ो के लिए मामा और बुआ का इंतज़ार!!
ये वक़्त ही तो था,जो आज बदल गया!!
हमारे चेहरों की मासूमियत को धीरे धीरे चुरा ले गया और
हम,
हम बस देखते ही रह गए!
कुछ न कर पाए अपने बचपन को जिन्दा रखने के लिए,
अफ़सोस तो बहुत है, पर क्या करे
ये वक़्त ना?
हर पल यही सन्देश गूंजता है
बड़ा अजीब है ये वक़्त ||
आज आँखें बंद करता हूँ, तो
पूरी जिंदगी मानों सामने से गुज़र रही हो
जेहन में वो सारी शैतानियाँ,
यादों में वो बचपन भी आता है,
जब मुझे पहला प्रेम हुआ था
या फिर किसी बात का झगड़ा
वो सारे जवाब यूँ ही मिल जाते हैं
जो मुझे बागी होने पर मजबूर करता था
क्यूँ माँ ने उस दिवाली पर नए कपड़े नहीं खरीदे थे
क्यूँ दीदी ने मुझे उस वक़्त डाँटा था
क्यूँ बुआ मुझको अकेले बाहर जाने नहीं देती थी
क्यूँ मुझे रेडियो नहीं सुनने दिया जाता था
और भी ना जाने कितने सवाल
हर सच, हर झूठ
हर ख़ुशी, हर गम
सब समझ आ जाता है
और खुद से कहता हूँ
बहुत कुछ हैं कहने को
बहुत कुछ हैं लिखने को
पर, क्या ये वक़्त सही हैं ?
बातें करनी हैं मुझे खुद से
कई सवालों के जवाब जानने हैं मुझे
नहीं मरना मुझे यूँ उलझन में
मैं इंतज़ार में हूँ
उस वक़्त के
जब वो डायरी मेरे हाथ में फिर से होगी
जब मैं फिर सुकून से बैठूंगा
इस भाग-दौड़ से कोसों दूर
निकल जाऊँगा अपनी दुनिया में
और फिर से वो सपने संजोऊँगा
अपना इतिहास लिखूंगा
जब मैं फिर से जियूँगा
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