सुबह उठते ही जब अखबार खोला तो,
दीपावली की शुभकामनाओं से पहला पन्ना पटा हुआ था,
लगा आज तो कम से कम अच्छी खबर पढ़ने को मिलेगी, पर
खुशियों को नज़र बस पल भर में ही लगती है, जैसे ही मैंने पन्ना पलटा
तो देखा, एक और फ्रंट पेज
रुदन, कोलाहल, बेबसी, लाचारी, गरीबी, भुखमरी,
अय्याशी, रेप, चोरी, मर्डर,
बॉर्डर पर सैनिको की हत्या,
नक्सली इलाकों में बढ़ता लाल-आतंकवाद,
और
हर राज्य, राजनेताओं, अभिनेताओं, पत्रकारों और
देश के कथित बुद्धिजीवी और कथित हिंदुत्ववादी द्वारा दीपावली के साथ-साथ क्रिसमस, मकर संक्रांति और गणतंत्र दिवस के लिए शुभकामना संदेश!!
उफ़...
मोबाइल पर ढेर सारी बधाइयों से थक चुका मैं अब हर पन्ने पर एक सरसरी निगाह डालते हुए अखबार के सम्पादकीय पेज पर जाने लगा,
एक अजीब सी टीस सी मच रही थी मन में,
हर पन्ने अपने मतदाताओं को लुभाने वाले राजनीतिक संदेशो के साथ अपने नेता को भगवान की पदवी देते हुए बधाई संदेशो से भरे हुए थे!!
खैर, सम्पादकीय पर पहुंचते हुए लगा,
यहाँ तो कुछ समाचार मिलेगा, पर अफ़सोस
शीर्षक से ही मन बैठ सा गया,
"योगी से राहुल तक, बदलता राजनीतिक रथ" और
"मोदी का मास्टर-स्ट्रोक"
अखबार रख देने में ही मुझे भलाई लगी!
क्या इन्ही संदेशो के लिए "गणेश शंकर" जैसे महान लोगो ने पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनाया?
आजादी की लड़ाई हो या आपातकाल का वक़्त,
इन्ही अखबारों ने शासकों की कुर्सियां तक हिला दी!
छोटा हूँ और शायद नासमझ भी,
पर इतना तो जानता हूँ कि
इन्ही अखबारों ने अटल जी का वो इमरजेंसी के बाद का वो भाषण,
जब इंदिरा जी के लाडले ने डी०डी० नेशनल पर फिल्म "बॉबी" का प्रसारण सिर्फ इसलिए करवाया कि शायद लोगों तक अटल जी की बात कम जाए, पर नतीजा?
बेतहासा भीड़, अटल जी के समर्थन में जिंदाबाद के नारे!
विजय शंखनाद! और
इन्ही अखबारों ने 2004 में इन्ही अटल जी को जनता का गुस्सा दिखाया!
एक अखबार असल में दो मायनों में उपयोग होता है,
दिन भर कई लोगों के हाथो से गुजरते हुए,
कभी किसी की यादो की आलमारी में विशेष जगह पाता है और
कभी रद्दी की तरह फेकने के!
अफ़सोस, आजकल रद्दी बेतहासा बढ़ रही है!
खैर, मुझे क्या लेना-देना,
ऑफिस जाने का टाइम हो रहा है और आज
हफ्ते का सबसे चार्मिंग दिन है-सोमवार !
और हां, आपको भी
हैप्पी दीपावली